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भारत के इतिहास के कुछ दंगे जिन्हे याद कर आज भी रूह काँप जाती है?

SK News Agency:

भारत के इतिहास में 31 अक्टुबर, 1984 का दिन काले दिन की तरह याद किया जाता है। उस दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही सिक्योरिटी गार्ड्स ने कर दी। अगले 24 घंटे में देशभर में सिखों के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूट पड़ा और दंगे भड़क उठे। सिखों को निशाना बनाकर उन्हें बेरहमी से मारा गया,उनके घर-दुकानें भी जला दी गईं। दंगों में कुल मौतों की संख्या 410 थी जबकि 1,180 लोग घायल हुए थे।

मलियाना दंगा- 1987

मई 1987 को मेरठ शहर में एक दिन के अंतराल में दो ऐसे दंगे हुए जिन्होंने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। 22 मई को हाशिमपुरा में हुए दंगे की चिंगारी से शहर झुलस उठा था। दूसरे ही दिन 23 मई में मलियाना के होली चौक पर सांप्रदायिक दंगा भड़का था। मलियाना में दंगाईयों ने 63 लोगों की हत्या कर दी थी और 100 से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे।
दंगे की शुरुआत अप्रैल 1987 में शबे-बरात के दिन मेरठ से शुरू हुई और रुक-रुक कर दो-तीन दिन महीनों तक चलती रही। इस दौरान क ई बार कर्फ्यू भी लगाया गया लेकिन हालात काबू से बाहर ही बने रहे।
घटनाक्रम के मुताबिक 23, म ई 1987 की दोपहर करीब 2 बजकर 30 मिनट पर पीएसी की 44वीन बटालियन के कमांडेंट और मेरठ के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का जत्था भारी पुलिस बल के साथ पहुंचा और वहां पहले से चल रहे दंगे को कंट्रोल करने के लिए।
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह और प्रधानमंत्री राजीव गांधी भी बाद में दंगा पीड़ितों से मिलने पहुंचे थे। 24 मई, 1987 को मेरठ के डीएम ने 12 लोगों के मारे जाने की बात स्वीकार की। जून 1987 में आधिकारिक रूप से 15 लोगों की हत्या की बात स्वीकार की गई। इस दौरान कई शव कुओं से बरामद हुए। 27 म ई 1987 को सीएम ने मलियाना दंगा मामले में न्यायिक जांच की घोषणा की थी।

भागलपुर दंगा 1989

भागलपुर दंगा 1989 को भुला दिए ग ए दंगे के रूप में याद किया जाता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दंगे में भागलपुर शहर और तत्कालीन भागलपुर जिले के 18 प्रखडों के 194 गांवों के ग्यारह सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे। सरकारी रिकार्ड्स ये बताते हैं कि यह दंगा दो महीने से ज्यादा चला था। जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं और दंगा पीड़ितों का कहना था कि लगभग 6 महीने तक दंगे होते रहे थे।

एन एन सिंह समिति की रिपोर्ट में 125 आईएएस और आईपीएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्तुति की गई थी। यह वही वक्त था जब कांग्रेस सरकार को भी दोषी ठहराया गया था।
पीपुल्स यूनियन फाॅर डेमोक्रेटिक राइट्स की 1996 में छपी एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि भागलपुर जिले मे़ सांप्रदायिक हिंसा का इतिहास कैसा रहा है। इस रिपोर्ट में 1924, 1946 और 1967 का ज़िक्र है।

1989 का दंगा इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि भागलपुर के ग्रामीण इलाकों में इस तरह की हिंसा इससे पहले कभी नहीं हुई थी। दंगा मामले में अब तक 346 लोगों को सजा हो चुकी है। इनमें 128 लोगों को उम्र कैद और बाकियों को 10 साल से कम की सजा मिल चुकी है।

गोधरा दंगा 2002

गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन पर 27 फरवरी 2002 को 23 पुरुष और 15 महिलाओं और 20 बच्चों सहित 58 लोग साबरमती एक्सप्रेस के कोच नंबर 56 में जिदा जला दिए गए थे। उस दौरान गुजरात के सहायक महानिदेशक जे महापात्रा ने कहा था कि दंगाई ट्रेन के गोधरा पहुंचने के पहले से पेट्रोल से लैस थे और पूरी तैयारी करके आए थे।
गुजरात में हुई इस घटना के बाद पूरा गुजरात सुलगने लगा था। पूरे गुजरात में दंगे देखने को मिले। साबरमती एक्सप्रेस की आग में कारसेवकों की मौत के बाद पूरे गुजरात में जगह-जगह हिंदू और मुसलमानों के बीच हिंसक टकराव हुए थे।
कहा तो यहां तक जाता है कि गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारों पर गोधरा में कारसेवकों पर जानलेवा हमला और उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप में हिंदुओं के संगठित दलों द्वारा मुस्लिमों पर जानलेवा हमले करवाए गए थे पुलिस मूकदर्शक बनी रही। हिंदुओं के समूहों ने गर्भवती बिलकिस बानो से सामूहिक बलात्कार,उसकी मासूम बेटी को पत्थर पर पटककर हत्या और उनके परिवार के सदस्यों की निर्मम हत्या को अंजाम दिया गया था। लेकिन यह सच मोदी के सीएम रहते सामने न आ सका।

2006 अलीगढ़ दंगा

5 अप्रैल 2006 को रामनवमी उत्सव के दौरान हिंदुओं और मुसलमानों के बीच हिंसा भड़क गई थी, जिसमें 5 लोगों की मौत हो गई थी।

 

2009 पुसद दंगा

2009 में महाराष्ट्र के पुसद में रामनवमी जुलूस को दूसरे समुदाय के लोगों की तरफ से बाधित किया गया और पथराव किया गया। पथराव के बाद माहौल हिंसक बन गया। दंगों में 70 से अधिक दुकानों को जला दिया गया था और संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया था।

 

2010 हजारीबाग हिंसा

रामनवमी उत्सव के अंतिम दिन झारखंड के हजारीबाग शहर और आसपास के इलाकों में लोगों के दो समूहों के बीच झड़प हुई। दुकानों में आगजनी और पुलिसकर्मियों पर पथराव के बाद कर्फ्यू लगा दिया गया था। रामनवमी जुलूस के दौरान इस्तेमाल किए जा रहे लाउडस्पीकर को लेकर एक समूह के लोगों ने आपत्ति जताई थी, जिसे लेकर विवाद बढ़ा। वहीं हजारी बाग में 2015 में मुहर्रम के जुलूस में लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर दंगा भड़का था। हिंसा में कई लोगों की मौतें भी हुई थी।

 

2018 पश्चिम बंगाल दंगे

पश्चिम बंगाल के रानीगंथ में रामनवमी के जुलूस के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोगों ने लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई। इसके बाद दोनों समुदायों के बीच हिंसा शुरू हो ग ई। पुलिसकर्मियों पर ईंटों और पत्थरों से हमला किया गया। भीड़ के हिंसक होते ही देसी बमों से बमबारी शुरू हो गई।

2019 पश्चिम बंगाल के आसनसोल में दंगे

पश्चिम बंगाल के आसनसोल में बराकर मारवाड़ी विधालय से निकाली ग ई रामनवमी के रैली पर पथरखव किया गया। जवाबी कार्रवाई हुई और हिंसा बढ़ गई।
2029 में राजस्थान के जोधपुर में 13 अप्रेल को सांप्रदायिक झड़प हुई थी। रामनवमी के जुलूस के दौरान मुसलमानों के एक वर्ग ने पथराव किया था।

2022 के दंगे

अप्रैल 2022 में भारतीय राज्यों गुजरात,मध्य प्रदेश,झारखंड और पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी। 10 अप्रैल 2022 को रामनवमी के मौके पर इन सभी राज्यों में हिंसा हुई और पुलिस अधिकारियों सहित दर्जनों लोग घायल हो गए। गुजरात में एक व्यक्ति की मौत हो गई।
इसी दौरान झारखंड के बोकारो और लोहरदगा के कम से कम दो जगहों पर झड़पों की सूचना मिली। बोकारो में रामनवमी जुलूस के लिए जा रहे कुछ युवकों पर हमला किया गया था। लोहरदगा में हिंसा बड़े पैमाने पर हुई। जिसमें दंगाईयों ने कई वाहनों को आग लगा दी। लोहरदगा में रामनवमी के जुलूस के दौरान पथराव सहित झड़प में कम से कम 12 लोग घायल हो गए।

वो दंगा जिसमे हिंदू और मुसलमान एक साथ मिलकर लड़े थे

आज से ठीक 100 साल पहले एक ऐसा दंगा हुआ था, जिसमें हिंदू और मुसलमान एक साथ मिलकर लड़े थे। ये दंगा गुलाम भारत के बाॅम्बे का ये दंगा नवंबर 1921 में हुआ था। इस दंगे को प्रिंस ऑफ वेल्स दंगे के नाम से जाना जाता है। ब्रिटेन के प्रिंस ऑफ वेल्स (एडवर्ड आठवें) नवंबर 1921 में भारत के अपने साम्राज्य के शाही दौरे पर आए थे। देश में उस समय महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन चल रहा था। गांधी उस वक्त हिंदू-मुस्लिम एकता की वकालत कर रहे थे।
सांप्रदायिक एकता के उस दौर में हिंदुओं और मुसलमानों
की एकता मजबूत हो गई थी। दोनों संप्रदायों की एकता ने बाकी अल्पसंख्यक समुदायों जैसे ईसाई, सिख, पारसी और यहूदी के मन में बहुसंख्यक समुदायों के वर्चस्व को लेकर भय का भाव पैदा कर दिया था। नतीजतन बहुसंख्यक समुदायों ने कुछ हिंसक वारदातों को अंजाम दिया।

कुलदीप मिश्र
राज्य ब्यूरो प्रमुख
उत्तर प्रदेश

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